भारत द इंडिया सकारात्मक तरंगों से कड़वे सच की यात्रा

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ब्रह्मांड का नियम कहता है कि जो हम देते हैं वह हमें बहुलता से वापिस मिलता है और आज भी यही हो रहा है |
प्राचीन भारत के लोग अपनी शिष्टता के कारण जाने जाते थे और इतिहास उनकी सहिष्णुता और धैर्य की हृदय विदारक कहानियों के साथ भरा हुआ है| उसके पीछे कौन सा जादू था? क्यूंकि उन्होंने अपने इष्ट के वचनों को अपने जीवन में धारण किया और अपने परिवार के सदस्यों को भी आध्यात्म सीखने की प्रेरणा दी| साधु-संतों ने चारों ओर पवित्रता की आभा बिखेरने के लिए ‘अच्छा सीखो और करो’ विधि बनाई| उन्होंने ब्रह्मांड को सभ्यता दी और ब्रह्मांड से बदले में धैर्य और सहिष्णुता ली|

हमारा देश सकारात्मकता और नैतिकता की तरंगों में गोते लगाता था| उस समय को वास्तव में धर्म-युग कहा जाता था| समय के बीतने के साथ और जब सकारात्मकता का स्थान नकारात्मक शक्ति ने ले लिया, तभी बुराई के युग ने रफ़्तार पकड़ी| नई-पीढ़ी ने संतों और प्रचारकों के विचारों को अपनाना बंद कर दिया| विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विश्वास ने उनको हमारे धर्मों की महा-विज्ञानता को देखने नहीं दिया| इसके बिना सब-कुछ केवल मूर्ति पूजा है जो केवल दूसरों को दिखाने के लिए है| यह अवधारणा नैतिक मूल्यों में गिरावट का कारण बनती है| आज के अमानवीय समय में देश में चारों ओर से बिना रुके दिल दहला देने वाले अपराधों की कहानियाँ सुनने को मिलती हैं | एक छोटे बच्चे प्रद्युमन ठाकुर की हत्या सबसे अमानवीय घटना है – जब रेयान अंतरराष्ट्रीय विद्यालय के एक किशोर ने केवल परीक्षा स्थगित करवाने के लिए उसे मार दिया| हत्यारे ने अपने गुनाह की बात कबूली और बताया कि यह घटना उसके आपा खोने के कारण और उसके घर में मामूली बातों पर हुए नियमित झगड़ों के कारण हुई| इसी नकारात्मक सोच की तरंगे ही अमृतसर रेल त्रासदी के रूप में हमारे पास पहुंची, जिसमें अमृतसर में रेलवे क्रासिंग पर रेल भीड़ को रौंदती हुई चली गई और काफी लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा|

अभी बुलंदशहर में हुआ हालिया मामला, गाय की मौत पर हुए संघर्ष का है| यह सभी उदाहरण हमारे चारों और फैली नकारात्मक सोच के कारण ही हैं जो मनुष्य को तर्कसंगत सोचने और परिस्थितियों में दृढ़ रहने की अनुमति नहीं देती| यही हिंसा को भी जन्म देती है| यद्यपि देश में कानून और व्यवस्था का प्रावधान है| हिंसा को रोकने के लिए कई नियम और विनियम बनाए जाते हैं और राज्य में प्रभावशाली ढंग से लागू भी किए जाते हैं ताकि समाज का कोई भी व्यक्ति कानून को अपने हाथ में न ले|

दर्शन शास्त्र कहता है कि जब हमें वर्तमान स्थिति का कोई प्रभावी हल नहीं मिलता तब इसका उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें वापिस इतिहास में जाना चाहिए| हमें अपनी धरती-रक्षा के लिए साधु-संतों की और मुड़ना चाहिए| साधुत्व पर किसी धर्म का एकाधिकार नहीं है| वे केवल उस अनादि ईश्वर की पवित्र शिक्षा का अभ्यास करते हैं और उसके ज्ञान के प्रकाश को चारों ओर बिखेरने का प्रयास करते हैं| इतिहास साक्षी है जब भी हिंसा और बेईमानी का बोलबाला होता है तब साधु-संत धार्मिक संस्कारों से हिंसा को समाप्त करते हैं| इसी संदर्भ में आसा राम, राधा स्वामी मत, संत राम पाल, श्री श्री रविशंकर, सदगुरु और बाबा राम रहीम का निष्पक्षता से एक सामान्य लक्ष्य का ज़िक्र करना चाहूंगा| ये प्रख्यात संत एक अनोखे गॉडमैन हैं, जिनको करोड़ों लोग फॉलो करते हैं| ख़ास तौर पर बाबा राम रहीम ने तो मानवता भलाई के अनेक कीर्तिमान भी स्थापित किए हैं|

उन्होंने लगभग 6 मिलियन लोगों को अपने मानवता मिशन के साथ जोड़ा ताकि देश का युवा वर्ग बुराइयों से बचा रहे| उनके भक्त उन्हें ईश्वर की तरह मानते हैं और उनके उपदेश को आज भी दृढ़ता से मानते हैं| वे ईश्वर के संदेशवाहक हैं या नहीं इस बात को अगर छोड़ भी दें तो यह मुद्दा सभी के लिए खुला है कि इन संतों की शिक्षा में सब से ज्यादा सहिष्णुता, धैर्य और खुद पर नियत्रण रखने का पाठ था| यदि उनके द्वारा समाज के निर्माण के प्रयत्नों पर विचार करें तो वे सराहनीय हैं| समाज को नशा-मुक्त बनाने का उनका मिशन और अन्य सामाजिक समस्याओं को हल करने के उनके प्रयास अद्भुत हैं| नशे का सेवन, शारीरिक और मानसिक समस्याओं को जन्म देता है| एक ओर तो ये हमारे शारीरिक अंगों पर बुरा प्रभाव डालते हैं तो दूसरी ओर हमारी सकारात्मक सोच को प्रभावित करते हैं और धैर्य स्तर को कम करते हैं जिसका परिणाम अपराध और अमानवीयता के रूप में देखा जा सकता है| यदि अकेले बाबा राम रहीम से प्रभावित 6 मिलियन लोग राष्ट्र के लिए इस धीमे ज़हर से छुटकारा प्राप्त सकते हैं तो सोच के देखिए यह हमारे देश का भाग्य है कि यहाँ अनोखा गॉडमैन है| मेरी शोध के अनुसार मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि इन अनोखे गॉडमैन समेत रामपाल, आसाराम बापू, श्री श्री रविशंकर, सदगुरु, अमृतानंदमयी, आशुतोष महाराज यहाँ तक कि भारत के धार्मिक और पवित्र स्थलों का होना, वेदों-शास्त्रों के पवित्र शब्द और हमारे धार्मिक संस्कार और मान्यताएं हमारी आध्यात्मिकता के महा विज्ञान होने को और समृद्ध बनाता है| ये अपने-आप में महाविज्ञान है लेकिन विडंबना है कि लोग ये सब हिंदू मान्यताएं भूल चुके हैं और धर्म का प्रयोग दिखावा मात्र बन के रह गया है जो झगड़ों और हिंसा को जन्म देता है| हमारी धार्मिक पुस्तकें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें भाईचारा और नैतिक तरीके सिखाती हैं|

जब सकारात्मक तरंगे समाज में फैलेंगी तो निश्चित रूप से सकारात्मक सोच का जन्म होगा| अपराध के मामलों में कटौती होगी| यहाँ अंत में मैं एक बात जरूर कहूंगा कि आम जनता इन धार्मिक संतों की शिक्षाओं को मानें न की इन्हे स्वयंभू मानकर इनकी आराधना करें| ज्ञानवान संतो और धार्मिक पुस्तकों की समाज में भूमिका को नाकारा नहीं जा सकता जो समाज में फैली नकारत्मकता का तोड़ हैं|

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