आधुनिक युग की साइंस कहा गयी अंकल?

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वैसे तो हम आज 21वीं सदी के आधुनिक भारत, (डिजिटल इंडिया) में जी रहे है और साइंस ने बहुत तरक्की की है, पर जिस तरह से देश के हालात है उससे हमें लगता है की हम आधुनिक भारत में नहीं जी रहें है ऐसे आधुनिक भारत को होने में अभी वर्षो लगगे|

अब मुजफ्फरनगर में फैले हुए चमकी बुखार यानि इन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) की बात करते है जो की 14 दिनों में 133 बच्चों की जिंदगी को अपना शिकार बना चूका है | इस बुखार के बारे में डॉक्टर को बीमारी और दवा दोनों की समझ नहीं आ रही|

MujaffarNagar

सरकारी मरहम पट्टी

इस दर्द को समझने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और राज्यमंत्री अश्वनी चौबे श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज अस्पताल, मुजफ्फरपुर में रविवार को पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया| मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी स्थिति का जायजा लेने आज मुजफ्फरपुर पहुंचे। जहां उन्होंने पीड़ित बच्चों का हाल जाना और डॉक्टर से इस बीमारी के इलाज की जानकारी ली और आपातकालीन बैठक बुला कर अस्पताल परिसर में 100 बैड का नया पीडियाट्रिक आईसीयू बनाने का निर्णय लिया और पीड़ित बच्चो के परिजनों को 4 -4 लाख रुपये मुआवज़ा देने का फैसला लिया|

एसकेएमसीएच समेत मुजफ्फरपुर के दो बड़े अस्पताल में 151 बच्चे भर्ती हैं जिसमे 21 की हालत गंभीर बनी हुई है। इलाज के अभाव में मासूमों की मौत का सिलसिला जारी है। औसतन तीन घंटे में एक बच्चे की मौत हो रही है|

बच्चो कि सख्या बढ़ते देख एक बेड पर तीन-तीन बच्चे भर्ती हो रहे है | कई बच्चो ने इस बुखार से अपनी जिंदगी तो बचा ली पर आँखों की रौशनी खो बैठे हैं|

सरकारी वादा

पांच साल पहले भी बिहार में 2014 में बच्चों की मौतें हुईं थी| 22 जून 2014 को पटना में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा था की यहां 100 बेड का अलग से अस्पताल बनाया जायेगा| अब जब फिर से ऐसी स्थिति बन गयी है तो 5 साल बाद यानि 16 जून 2019 केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने दोबारा वो ही वादा दोहराया।

कुदरत पर निर्भर है

इस बुखार से हतास परिजन, डॉक्टर, प्रशासन अब बारिश के इंतजार में है, क्योंकि बारिश के बाद इस बीमारी में ठहराव आता है जिससे थोड़ी राहत मिल सकती है| अस्पताल के शिशु रोग विभाग के डॉ. गोपाल शंकर साहनी ने बताया कि यह बीमारी न ताे वायरल है और न ही इंसेफेलाइटिस। इस बुखार की दिल्ली पुणे के साथ साथ अटलांटा के बेस्ट रिसर्च इंस्टीच्यूट में भी जांच हाे चुकी है पर कहीं भी वायरस नहीं मिला। एक अफवाह से लोग इसे लीची से भी जोड़ रहे हैं। लेकिन, कही से भी इस बुखार से संबंध लीची से साबित नहीं हुआ। एक शोध के अनुसार जब तापमान 38 से अधिक और आर्द्रता 60-65 पहुंचती है, इस बीमारी के मामले सामने आने लगते हैं। इसलिए ऐसा मौसम इस बीमारी की मुख्य वजह है। जिससे निजात पाने के लिए कुदरत के सहारा ही एक मात्र सहारा है|

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